मैं वो कलम
जिसकी स्याही से शब्द उतरते हैं, और उन शब्दों की मात्राओं में भावनाएँ बयान होती हैं।
मैं वो कलम
जो मनुष्य का औज़ार है, अपने अनुभव और नज़रिया को बयान करने का और अपने भीतर के विचारों को समझने का।
मैं वो कलम
जिसकी अहमियत हमेशा वही है जो कल थी, बस बदलती और बढ़ती दुनिया में अब नज़र आना कम हो गया है।
मैं वो कलम
एक दौर था जब हर जेब और हर बैग में मेरी जगह थी, पर आज वो जगह मोबाइल की है।
पर अहमियत तो आज भी वही है, एक बार फिर से मुझे थामकर देख लीजिए।
मैं वो कलम
जिससे आज भी कहानियाँ लिखी जाती हैं, विचार भी, राय भी, सलाह भी, अनुभव भी, पर वो अब "डेटा" कहलाता है।
मैं वो कलम
तेज़ी से बढ़ते दौर में लिखना आसान हो गया है, पर जब इंसान को खुद को समझना होता है, तो मेरी ही ज़रूरत पड़ती है।
मैं वो कलम
जिसके शब्दों के वाक्य ही इमोजी हैं, जो लोगों को हँसाते हैं, रुलाते हैं, डराते हैं, चौंकाते हैं, बस एक बार मुझसे लिखकर देखिए।
मैं वो कलम
पुराण हो, इतिहास हो, सिनेमा हो, सब मेरे ही शब्द हैं, बस लिखने वाले बदलते रहते हैं।
मैं वो कलम
जिसके शब्दों में एक साँस का ठहराव और इंतज़ार महसूस किया जा सकता है।
मैं वो कलम
जिसकी एक दस्तख़त से तक़दीरें बदल जाती हैं, कभी किसी का घर बनता है, कभी किसी का फ़ैसला।
मैं वो कलम
जिसके सहारे डायरी के पेज में वो राज़ महफ़ूज़ रहते हैं जो किसी से कहे नहीं जाते।
मैं वो कलम
जिससे आज़ादी के नारे लिखे गए, और जिसकी धार तलवार से भी ज़्यादा थी।
मैं वो कलम
जिससे संविधान की पहली पंक्ति भी लिखी गई और माँ की रसोई का सामान मँगाने की सूची भी।
मैं वो कलम
जिसकी लिखावट से इंसान की असली पहचान हो जाती है।
मैं वो कलम
जिससे लिखा हर शब्द सोच-समझकर लिखा जाता है, क्योंकि वो शब्द काटा जा सकता है, पर पूरा मिटाया नहीं जा सकता।
मैं वो कलम
आज भी मेरी भूमिका वही है, बस रंग और रूप अलग है।
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